मजेदार लगते हैं कितने यार, बताशे पानी के

बताशे पानी के 
-सुंदरलाल अरूणेश-

मजेदार लगते हैं कितने यार, बताशे पानी के। 
देता लच्‍छूराम रूपये में चार बताशे पानी के। 

इनका पानी याद करो, तो मुँह में भर आता पानी, 
इन्‍हें गोलगप्‍पा भी कहते, सूरत जानी पहचानी। 
इसीलिए पाते हैं सबका प्‍यार, बताशे पानी के।

थोड़ी मिली खटाई इसमें, खुश्‍बूदार मसाला है, 
टिक्‍की, खस्‍ता से भी बढ़कर इनका स्‍वाद निराला है। 
पापड़ जैसे कड़क कुरमुरे यार बताशे पानी के।

देर नहीं लगती है, मुँह में रखते ही ये घुल जाते, 
कभी कभी मम्‍मी पापा भी इन्‍हें देखकर ललचाते। 
खाओ भी चटपटे जायकेदार बताशे पानी के।

बस्‍ता मुझसे भारी है

-अवश्‍घोष-

यह कैसी लाचारी है 
बस्‍ता मुझसे भारी है।

कंधा रोज भड़कता है, जाने क्‍या क्‍या बकता है,
लाइलाज बीमारी है, बस्‍ता मुझसे भारी है।

जब भी मैं पढ़ने जाता, जगह जगह ठोकर खाता,
बस्‍ता क्‍या अलमारी है, बस्‍ता मुझसे भारी है।

कान फटे सुनते सहते, मुझे देखकर सब कहते,
बालक नहीं, मदारी है, बस्‍ता मुझसे भारी है।

ये जामुन काले काले हैं

 -विनोदचंद्र पाण्‍डेय ‘विनोद’-

ये जामुन काले काले हैं। 

जब बादल जल बरसाते हैं, ये पेड़ों पर पक जाते हैं,
भौरों सा रूप दिखाते हैं, करते सबको मतवाले हैं।

होते सब खूब रसीले हैं, बैंगनी, लाल या नीले हैं,
सब के सब रंग रंगीले हैं, सुंदर सुकुमार निराले हैं।

देखो, डालों पर लटके हैं, गिरते जब लगते झटके हैं,
बच्‍चे खाते डट डट के हैं, बेचते इन्‍हें फलवाले हैं।

मानो रस में ही पगते हैं, सबको ही अच्‍छे लगते हैं,
ले भी लो बिलकुल सस्‍ते हैं, सब पर जादू सा डाले हैं।

प्‍यासी प्‍यासी सोन चिरैया पानी दो

-रामसेवक शर्मा- 
प्‍यासी प्‍यासी सोन चिरैया पानी दो। 
 बादल भैया प्‍यासी बुढिया पानी दो।

पिछली बार बहुत कम बरसे तरसे हम। 
अब की बार बरसना जमके हरषें हम। 

प्‍यासी प्‍यासी नीम निबरिया पानी दो।
 प्‍यासी प्‍यासी सोन चिरैया पानी दो।

उठा घटाऍं काली काली अड़ अड़ धम। 
गरज गरज के बरसो ऑंगन झर झर झम। 

प्‍यासी प्‍यासी ताल मछरिया पानी दो।
प्‍यासी प्‍यासी सोन चिरैया पानी दो। 

झूलों का मौसम आएगा झूलेंगे। 
पेंग बढ़ाके आसमान को छू लेंगे। 

प्‍यासी प्‍यासी श्‍याम कुयलिया पानी दो।
प्‍यासी प्‍यासी सोन चिरैया पानी दो।
चित्र साभार- http://openfsm.net

धरती माँग रही है पानी, बादल बरसो

-राधेश्याम प्रगल्भ-

धरती माँग रही है पानी, बादल बरसो।
फूटे अंकुर मिले जवानी, बादल बरसो।
पहनेगी यह चूनर धानी, बादल बरसो।
बहल जाएगी गुडिया रानी, बादल बरसो।

भीगेंगे हम सब फुहार में, बादल बरसो।
रंग आ जाएगा बहार में, बादल बरसो।
गाएगा कोई मल्हार में, बादल बरसो।
रोगी मुस्कान बुखार में, बादल बरसो।

फूलों पर मुस्कान खिलेगी, बादल बरसो।
बच्चों की टोली किलकेगी, बादल बरसो।
गली गली धारा मचलेगी, बादल बरसो।
कागज की नौका तैरेगी, बादल बरसो।

देख रहे हम कब से राहें, देखो, बरसो।
खड़े हुए फैलाए बाँहें, देखो, बरसो।
पूरी होंगी अनगिन चाहें, देखो, बरसो।
तुम पर हसरत भरी निगाहें, देखो, बरसो।

गुस्सा हैं हम, जाओ जी


–उषा यादव–

बिल्कुल नहीं आज मानेंगे, चाहे लाख मनाओ जी।
गुस्सा हैं हम, जाओ जी।

हर इतवार हमें चि‍डियाघर, चलने का लालच देंगे।
और उसी दिन दुनिया भर के कामों को फैला लेंगे।

बुद्धू हमें समझ रखा है, चाकलेट सेबहलाते।
टूटी आस लिये हम बच्चे, खड़े टापते रह जाते।

नहीं खायेंगे,नहीं खायेंगे, टाफी लाख खिलाओ जी।
गुस्सा हैं हम, जाओ जी।

झूठ अगर बच्चे बोलें तो, खूब डांट वे खाते हैं।
यही काम पापाजी करते, और साफ बच जाते हैं।

मम्मी बच्चों के दल में मिल, इनको डाँट लगाओ तुम।
वरना तुम से भी कुट्टी है, दूर यहाँ से जाओ तुम।

मुँह फूला ही रखेंगेअब, चाहे लाख हंसाओ जी।
गुस्सा हैं हम, जाओ जी।

सैर-सपाटा


-विष्णुकांत पाण्डेय-

मोटर पर चढ़ बन्दर निकला,
करने सैर-सपाटा।

चौराहे पर खड़ी पुलिस को
उसने रूक कर डांटा।

बेवकूफ हट जा आगे से,
आती मेरी गाड़ी।

दबकर मर जाएगा नाहक,
कैसा निपट अनाड़ी।

जादू की पु‍डिया सा मौसम


कभी ताड़ सा लम्बा दिन है कभी सींक सा लगता।
जादू की पु‍डिया सा मौसम, रोज बदलता रहता।।

कुहरा कभी टूट कर पड़ता, चलती कभी हवाएं।
आए कभी यूं आंधी कि कुछ समझ में नहीं आए।

जमने लगता खून कभी तो सूरज कभी पिघलता।।
जादू की पु‍डिया सा मौसम, रोज बदलता रहता।।

कभी बिकें अंगूर, अनार व कभी फलों का राजा।
कभी – कभी हैं बिकते जामुन बाज़ारों में ताज़ा।

लीची आज और कल आड़ू, मस्ती भरा उछलता।
जादू की पु‍डिया सा मौसम, रोज बदलता रहता।।

बढ़ता जाता समय तेज गति हर कोई बतलाए।
छूट गया जो पीछे, वो फिर लौट कभी न आए।

पछताए वो, काम समय से जो अपना न करता।
जादू की पु‍डिया सा मौसम, रोज बदलता रहता।।

-ज़ाकिर अली 'रजनीश'
महामंत्री-तस्‍लीम, साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन

कर दो जी हड़ताल

कर दो जी हड़ताल
-योगेन्‍द्र कुमार लल्‍ला-

कर दो जी, कर दो हड़ताल, पढ़ने लिखने की हो टाल।
बच्‍चे घर पर मौज मनाऍं, पापा मम्‍मी पढ़ने जाऍं।
मिट जाए जी का जंजाल, कर दो जी, कर दो हड़ताल।

जो न माने हमारी माने बात, उसके बॉंधों कस कर हाथ।
कर उसको घोटम घोट, पहनाकर केवल लंगोट।
भेजो उसको नैनीताल, कर दो जी, कर दो हड़ताल।

राशन में भी करो सुधार, रसगुल्‍लों की हो भरमार।
दो दिन में कम से कम एक, मिले बड़ा सा मीठा केक।
लडडू हो जैसे फुटबाल, कर दो जी, कर दो हड़ताल।

हम भी अब जाऍंगे दफतर, बैठेंगे कुरसी पर डटकर।
जो हमको दे बिस्‍कुट टॉफी, उसको सात खून की माफी।
अपना है बस यही सवाल, कर दो जी, कर दो हड़ताल।

बड़ी शरम की बात

बड़ी शरम की बात
-दामोदर अग्रवाल-

बड़ी शरम की बात है बिजली, बड़ी शरम की बात।

जब देखो गुल हो जाती हो, ओढ़ के कंबल सो जाती हो,
नहीं देखती हो यह यह दिन है, या यह काली रात है बिजली,
बड़ी शरम की बात,
बड़ी शरम की बात है बिजली, बड़ी शरम की बात।।

हम गाना गाते होते हैं, या खाना खाते होते हैं,
पता नहीं चलता थाली में, किधर दाल औ भात, है बिजली,
बड़ी शरम की बात,
बड़ी शरम की बात है बिजली, बड़ी शरम की बात।।

जाओ मगर बता के जाओ, कुछ तो शिष्‍टाचार दिखाओ,
नोटिस दिए बिना चल देना, तो भारी उत्‍पात है बिजली, है बिजली,
बड़ी शरम की बात,
बड़ी शरम की बात है बिजली, बड़ी शरम की बात।।

चित्र साभार- www.toonpool.com

बतूता का जूता

बतूता का जूता

-सर्वेश्‍वरदयाल सक्‍सेना-

इब्‍न बतूता पहन के जूता, निकल पड़े तूफान में।

थोड़ी हवा नाक में घुस गई, घुस गई थोड़ी कान में।

कभी नाक को, कभी कान को, मलते इब्‍न बतूता।

इसी बीच में निकल पड़ा, उनके पैरों का जूता।

उड़ते उड़ते जूता उनका, जा पहुँचा जापान में।

इब्‍न बतूता खड़े रह गए, मोची की दूकान में।

फोटो साभार- www.clipartguide.com/