हिन्दी ब्लॉगर्स अवार्ड

"संवाद डॉट कॉम" द्वारा 20 श्रेणियों में दिये जाने वाले 2009 के श्रेष्ठ ब्लॉगर्स सम्मान की घोषणा प्रारम्भ हो चुकी है।

फूल बनकर मुस्कराना चाहिए


-रोहिताश्व अस्थाना

जिंदगी हंसकर बिताना चाहिए।
चुटकुले सुनना-सुनाना चाहिए।

रात-दिन आँसू बहाने से भला,
फूल बनकर मुस्कराना चाहिए।

चाट का ठेला खड़ा है सामने,
आज कुछ खाना-खिलाना चाहिए।

आ गया इतवार, पापा जी हमें,
आज तो सरकस घुमाना चाहिए।

एक सीमा तक करें शैतानियाँ,
ना किसी का दिल दुखाना चाहिए।

मास्टरजी हम पढ़ेंगे शौक से,
पर खिलौने कुछ दिलाना चाहिए।

देश को खुशहाल रखना है अगर,
हमको संसद में बिठाना चाहिए।

देख खुली कमरे की खिड़की, चुपके से घुस आती है।


- संभव शर्मा -


यह ठण्डी जब आती है
हमको बहुत सताती है


सूरज से पर डरती है,
देख उसे छुप जाती है।


हवा सहेली पक्की है,
उसके संग इठलाती है।



पानी के संग मिलकरके,
काट हमें वह खाती है।


देख खुली कमरे की खिड़की,
चुपके से घुस आती है

माँ से उसकी बड़ी दुश्मनी,
कम्बल, टोप उढ़ाती है

किताबें कुछ कहना चाहती हैं, तुम्हारे पास रहना चाहती हैं।


-सफदर हाशमी-


किताबें कुछ कहना चाहती हैं
तुम्हारे पास रहना चाहती हैं।

 
किताबें करती हैं बातें
बीते ज़मानों की
दुनिया की, इंसानों की
आज की, कल की
एक-एक पल की।
ख़ुशियों की, ग़मों की
फूलों की, बमों की
जीत की, हार की
प्यार की, मार की।
क्या तुम नहीं सुनोगे
इन किताबों की बातें ?

किताबें कुछ कहना चाहती हैं।
तुम्हारे पास रहना चाहती हैं।
किताबों में चिड़िया चहचहाती हैं
किताबों में खेतियाँ लहलहाती हैं
किताबों में झरने गुनगुनाते हैं
परियों के किस्से सुनाते हैं
किताबों में राकेट का राज़ है
किताबों में साइंस की आवाज़ है
किताबों में कितना बड़ा संसार है
किताबों में ज्ञान की भरमार है।

क्या तुम इस संसार में
नहीं जाना चाहोगे?
किताबें कुछ कहना चाहती हैं
तुम्हारे पास रहना चाहती हैं।

फूलों से होते हैं बच्चे, सच है ये। और सभी होते हैं अच्छे, सच है ये।


- डा0 अजय जनमेजय -

फूलों से होते हैं बच्चे, सच है ये।
और सभी होते हैं अच्छे, सच है ये।

इक पल रूठें तो दूजे पल हंसते हैं,
मानो मुस्कानों के लच्छे, सच है ये।

इनकी आँखों में खुद को पढ़ सकते हो,
दरपन जैसे बिलकुल सच्चे, सच है ये।

जो सोचें वो करके ही दम लेते हैं,
अपनी धुन के पूरे पक्के, सच है ये।

इतना खेलें भागे-दौड़ें सांस चढ़ी,
कब बैठे हैं फिर भी थक के, सच है ये।

मन के भोले दिल में भी तो भेद नहीं,
सब जैसे माना के मनके, सच है ये।

बहुत ठण्ड में प्यारे लगते छुट्टी के दिन सात।



-राकेश 'सोहम'-

बहुत ठण्ड में प्यारे लगते छुट्टी के दिन सात।
सू-सू-किट-किट करते रहते हम सब दिन औ रात।

स्वेटर, जॉकेट पहने-ओढ़ें घर में रहते बंद।
धुप सेंककर, आग तापकर दूर भगाते ठण्ड।
 
बड़े घरों में चालू होते गीजर और हीटर।
नाक-कान बन जाते हैं सर्दी के थर्मामीटर।

पढ़े धूप में या बिस्तर में कोई हमें बता दे।
मन करता है हम बिस्तर में जा करके सो जाते।

हम धरती के फूल, हमीं हैं खुश्बू वाले झरने।


-कृष्ण शलभ-
हम धरती के फूल, हमीं हैं खुश्बू वाले झरने।

उड़े हवा के पंख लगा कर, कोई क्या उड़ पाए।
गुस्सा होती दादी अम्मा हमें देख हंस जाए।

बिना हमारे दादी माँ को घर भर लगे अखरने।
अम्मा की लोरी, बाबा की किस्सों भरी ‍िकताब।

चाचा नेहरू की अचकन के हम ही रहे गुलाब।
जहाँ–जहाँ हम जाएं भैया मस्ती लगे बिखरने।

सूरदास केहमीं कन्हैया हम तुलसी के राम।
वीर शिवा, बन्दा बैरागी सभी हमारे नाम।

हम कच्ची मिट्टी हैं जैसा चाहो लगे संवरने।

अले, छुबह हो गई।


 अले, छुबह हो गई, आँगन बुहाल लूं,
मम्मी के कमले की तीदें थमाल लूँ।

कपले ये धूल भले, मैले हैं यहाँ।
ताय भी बनाना है, पानी भी लाना है।

पप्पू की छर्ट फटी, दो ताँके दाल लूं।

कलना है दूध गलम, फिर लाऊं तोस्त नलम।
झट छे इछतोब जला, बलतन फिल एक चढ़ा।

कल के ये पले हुए आलू उबाल लूँ।

आ गया ‘पलाग’ नया, काम छभी भूल गया।
जल्दी में क्या कल लूँ, चुपके से अब भग लूँ।

छंपादक दादा के नए हाल-चाल लूँ।

लाला जी की बड़ी तोंद है, घंटाघर की घड़ी तोंद है।


-सूर्यभानु गुप्त-

लाला जी की बड़ी तोंद है।
घंटाघर की घड़ी तोंद है।।

लाला जी से मिलो बाद में,
उनसे पहले खड़ी तोंद है।

कुरते में घुसने से पहले,
रोज लड़ाई लड़ी तोंद है।

बस में चढ़ते और उतरते,
दरवाजे में अड़ी तोंद है।

किसी अंगूठी में ज्यों हीरा,
लाला जी में जड़ी तोंद है।

बच्चे-बूढ़े सभी छुड़ाते,
हाथ लगी फलझड़ी तोंद है।

चंदा मामा, चंदा मामा, मामी जी कब लाओगे?


-सूर्यभानु गुप्त-

चंदा मामा, चंदा मामा, मामी जी कब लाओगे?
दूध-भात भांजों का अपने, बोलो कब तक खाओगे?

चंदा मामा, चंदा मामा, लगते कितने प्यारे हो।
लेकिन यह बतलाओ अब तक, तुम क्यों भला कुंवारे हो।

चंदा मामा, चंदा मामा, मानो बात हमारी भी।
ब्याह रचाओ, मामी लाओ, किरणों की फुलवारी सी।

चंदा मामा, चंदा मामा, मामी जी जब आएंगी।
आकर रोज तुम्हारी खातिर, पूड़ी-खीर बनाएंगी।

चंदा मामा, चंदा मामा, हम राकेट में आएंगे।
मामी के हाथों की आकर, पूड़ी-खीर उड़ाएंगे।

लगते हैं केले के पत्ते, हाथी जैसे कान



-सुरेश विमल-
लगते हैं केले के पत्ते, हाथी जैसे कान।

पीपल के पत्तों की होती चूहे जैसी पूँछ,
ताड़-वृक्ष के पत्ते लगते रावण की सी मूँछ।
पात कमल के देख-देख आता कछुए का ध्यान।

दिखते हैं खटमल जैसे पत्ते हैं इमली के,
सेही के शरीर से होते पत्ते नागफनी के।
पात खजूरों के लगते हैं तरकस के-से बान।

बढ़ा-बढ़ा नाखून, चबाना उन्हें दांत से, छी: छी:



-सुरेश विमल-

बढ़ा-बढ़ा नाखून, चबाना उन्हें दांत से, छी: छी:
बड़-बड़े बालों में पंजें डाल खुजाना, छी: छी:

केले खाकर छिलके देना फेंक सड़क पर, छी: छी:
मक्खी भरे खोमचों से खा लेना चीजें, छी: छी:

मैले कपड़े पहन घूमना नहीं नहाना, छी: छी:
दातुन-कुल्ला किए बिना ही बिस्कुट खना, छी: छी:

धूल भरी गलियों में जाकर दौड़ लगाना, छी: छी:
गंदे पानी में कागज की नाव चलाना, छी: छी:

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