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...गर्मी को पानी से धोएँ, बारिश को हम खूब सुखाएँ

 
उनका मौसम
देवेन्‍द्र कुमार

गर्मी को पानी से धोएँ
बारिश को हम खूब सुखाएँ

जाड़े को फिर सेंक धूप से
अपनी दादी को खिलवाएँ।

कैसा भी मौसम हो जाए
उनको सदा शिकायत रहती

इससे तो अच्‍छा यह होगा
उनका मौसम नया बनाएँ।

काम दिखता है, दाँत नहीं है,
पैरों से भी चल न पातीं

बैठी-बैठी रटती रहतीं
न जाने कब राम उठाएँ।

शुभ-शुभ बोलो प्‍यारी दादी,
 दर्द भूलकर हँस दो थोड़ा

आँख मूँदकर देखो अब तुम
 हम सब मिलकर लोरी गाएँ।

क्‍यों पसंद हैं हरदम तुमको फूलों के ही साये?

 
क्‍यों पसंद हैं हरदम तुमको फूलों के ही साये ? 
अश्‍वनी कुमार पाठक 

क्‍यों पसंद हैं हरदम तुमको फूलों के ही साये ? 
किस अलबेले चित्रकार से, तुमने पंख रंगाये ? 

क्‍यों कहते हैं बच्‍चे तुमको, तितली, तितली रानी? 
क्‍यों लगती तुम उनको इतनी, प्‍यारी और सुहानी? 

तुम्‍हें देखकर मुन्‍ना-मुन्‍नी, नन्‍हें हाथ बढ़ाते। 
 पंख तुम्‍हारे चुटकी में, आते-आते रह जाते। 

तुम फूलों पर बैठ-बैठ कर, मीठा रस पीती हो। 
 भौरों से बतियाती रहती, मस्‍ती में जीती हो।

बाबा की बातें रंगीन

बातें हैं रंगीन
देवेन्‍द्र कुमार 

बाबा के हैं बाल सफेद
पर उनकी बातें रंगीन।

सुबह टहलने रोज निकलते 
अपने काम सभी खुद करते 
छत पर उनकी कसरत का तो 
मजेदार होता है सीन। 

हरदम कुछ-कुछ करते रहते 
दादी से बिन बात झगड़ते 
नकली दाँत दिखाकर पूँछे 
मुँह में दाँत बचे क्‍यों तीन। 

रोज कहानी हमें सुनाते 
अपने बचपन में ले जाते 
बोले, अब दुनिया घूमूँगा 
कल सपने में देखा चीन।

...हालत मेरी खस्‍ता है।

 

हालत मेरी खस्‍ता है

-सूर्य कुमार पाण्‍डेय

टीचर जी, ओ टीचर जी,
हालत मेरी खस्‍ता है।

के जी टू में पढ़ती हूँ,
टू केजी का बस्‍ता है।

चलूँ सड़क पर रिक्‍शा वाला,
मुझे देख कर हँसता है।

एक सवारी और लाद लो,
ताने मुझपर कसता है।

बोझ किताबों का कम करिए,
बड़ी दूर का रस्‍ता है।

नन्‍हें फूलों पर क्‍यों रक्‍खा,
यह भारी गुलदस्‍ता है।

टीचर जी, ओ टीचर जी,
हालत मेरी खस्‍ता है।

...आओ खेलें होली।


आओ खेलें होली

-कृष्‍णेश्‍वर डींगर

 

आओ बनाएँ टोली,
हिल-मिल खेलें होली।

रंगों से भर झोली,
हाथों में ले रोली।

जमकर करें ठिठोली,
बचें न भोला-भोली।

घर-घर बने रंगोली,
कोठी हो या खोली।

कोई भाषा या बोली,
मिल-‍जुल खेलें होली।