
पतंग
-अश्वनी कुमार पाठक
नीली-पीली, लाल पतंग, उड़ती है बादल के संग।
नभ में मस्ती से लहराती, मानो चली छानकर भंग।
नीचे आती, गुटके खाकर, उठ जाती है, फिर सन्नाकर।
दाएँ-बाएँ शीश झुकाकर, ढील मिली चढ़ जाती चंग।
मोनू-सानू जल्दी आओ, सद्दी में मंझा लगवाओ।
चरखी में चढ़वा लो धागा, आज पतंगों की है जंग।
नीचे के काने में पुच्छी, और बीच में हो गलमुच्छी।
इससे सीखो ऊँचा उठना, इसके बड़े निराले ढंग।।






