हिन्दी ब्लॉगर्स अवार्ड

"संवाद डॉट कॉम" द्वारा 20 श्रेणियों में दिये जाने वाले 2009 के श्रेष्ठ ब्लॉगर्स सम्मान की घोषणा प्रारम्भ हो चुकी है।

सैर-सपाटा


-विष्णुकांत पाण्डेय-

मोटर पर चढ़ बन्दर निकला,
करने सैर-सपाटा।

चौराहे पर खड़ी पुलिस को
उसने रूक कर डांटा।

बेवकूफ हट जा आगे से,
आती मेरी गाड़ी।

दबकर मर जाएगा नाहक,
कैसा निपट अनाड़ी।

जादू की पु‍डिया सा मौसम


कभी ताड़ सा लम्बा दिन है कभी सींक सा लगता।
जादू की पु‍डिया सा मौसम, रोज बदलता रहता।।

कुहरा कभी टूट कर पड़ता, चलती कभी हवाएं।
आए कभी यूं आंधी कि कुछ समझ में नहीं आए।

जमने लगता खून कभी तो सूरज कभी पिघलता।।
जादू की पु‍डिया सा मौसम, रोज बदलता रहता।।

कभी बिकें अंगूर, अनार व कभी फलों का राजा।
कभी – कभी हैं बिकते जामुन बाज़ारों में ताज़ा।

लीची आज और कल आड़ू, मस्ती भरा उछलता।
जादू की पु‍डिया सा मौसम, रोज बदलता रहता।।

बढ़ता जाता समय तेज गति हर कोई बतलाए।
छूट गया जो पीछे, वो फिर लौट कभी न आए।

पछताए वो, काम समय से जो अपना न करता।
जादू की पु‍डिया सा मौसम, रोज बदलता रहता।।

-ज़ाकिर अली 'रजनीश'
महामंत्री-तस्‍लीम, साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन

कर दो जी हड़ताल

कर दो जी हड़ताल
-योगेन्‍द्र कुमार लल्‍ला-

कर दो जी, कर दो हड़ताल, पढ़ने लिखने की हो टाल।
बच्‍चे घर पर मौज मनाऍं, पापा मम्‍मी पढ़ने जाऍं।
मिट जाए जी का जंजाल, कर दो जी, कर दो हड़ताल।

जो न माने हमारी माने बात, उसके बॉंधों कस कर हाथ।
कर उसको घोटम घोट, पहनाकर केवल लंगोट।
भेजो उसको नैनीताल, कर दो जी, कर दो हड़ताल।

राशन में भी करो सुधार, रसगुल्‍लों की हो भरमार।
दो दिन में कम से कम एक, मिले बड़ा सा मीठा केक।
लडडू हो जैसे फुटबाल, कर दो जी, कर दो हड़ताल।

हम भी अब जाऍंगे दफतर, बैठेंगे कुरसी पर डटकर।
जो हमको दे बिस्‍कुट टॉफी, उसको सात खून की माफी।
अपना है बस यही सवाल, कर दो जी, कर दो हड़ताल।

बड़ी शरम की बात

बड़ी शरम की बात
-दामोदर अग्रवाल-

बड़ी शरम की बात है बिजली, बड़ी शरम की बात।

जब देखो गुल हो जाती हो, ओढ़ के कंबल सो जाती हो,
नहीं देखती हो यह यह दिन है, या यह काली रात है बिजली,
बड़ी शरम की बात,
बड़ी शरम की बात है बिजली, बड़ी शरम की बात।।

हम गाना गाते होते हैं, या खाना खाते होते हैं,
पता नहीं चलता थाली में, किधर दाल औ भात, है बिजली,
बड़ी शरम की बात,
बड़ी शरम की बात है बिजली, बड़ी शरम की बात।।

जाओ मगर बता के जाओ, कुछ तो शिष्‍टाचार दिखाओ,
नोटिस दिए बिना चल देना, तो भारी उत्‍पात है बिजली, है बिजली,
बड़ी शरम की बात,
बड़ी शरम की बात है बिजली, बड़ी शरम की बात।।

चित्र साभार- www.toonpool.com

बतूता का जूता

बतूता का जूता

-सर्वेश्‍वरदयाल सक्‍सेना-

इब्‍न बतूता पहन के जूता, निकल पड़े तूफान में।

थोड़ी हवा नाक में घुस गई, घुस गई थोड़ी कान में।

कभी नाक को, कभी कान को, मलते इब्‍न बतूता।

इसी बीच में निकल पड़ा, उनके पैरों का जूता।

उड़ते उड़ते जूता उनका, जा पहुँचा जापान में।

इब्‍न बतूता खड़े रह गए, मोची की दूकान में।

फोटो साभार- www.clipartguide.com/

चाँद का सफर

चाँद का सफर
-कन्हैयालाल मत्त-

चूहे राजा चले चाँद पर, लेकर रॉकेट एक।

मक्खन के डिब्बे बिस्कुट के पैकेट लिए अनेक।

बोतल भूल गए पानी की हुआ बड़ा अफसोस।

चाँद वहाँ से बहुत दूर था, धरती थी दो कोस।

रॉकेट की खिड़की से फौरन मारी एक छलाँग।

बिस्कुट मक्खन छोड़ छाड़कर नीचे गिरे धड़ाम।

चित्र साभार- http://members.madasafish.com/

यदि होता किन्नर नरेश मैं

यदि होता किन्नर नरेश मैं
-द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी-

यदि होता किन्नर नरेश मैं, राजमहल में रहता,
सोने का सिंहासन होता, सिर पर मुकुट चमकता।

बंदी जन गुण गाते रहते, दरवाजे पर मेरे,
प्रतिदिन नौबत बजती रहती, संध्या और सवेरे।

मेरे वन में सिह घूमते, मोर नाचते आँगन,
मेरे बागों में कोयलिया, बरसाती मधु रस-कण।

यदि होता किन्नर नरेश मैं, शाही वस्त्र पहनकर,
हीरे, पन्ने, मोती माणिक, मणियों से सजधज कर।

बाँध खडग तलवार सात घोड़ों के रथ पर चढ़ता,
बड़े सवेरे ही किन्नर के राजमार्ग पर चलता।

राज महल से धीमे धीमे आती देख सवारी,
रूक जाते पथ, दर्शन करने प्रजा उमड़ती सारी।

जय किन्नर नरेश की जय हो, के नारे लग जाते,
हर्षित होकर मुझ पर सारे, लोग फूल बरसाते।

सूरज के रथ सा मेरा रथ आगे बढ़ता जाता,
बड़े गर्व से अपना वैभव, निरख-निरख सुख पाता।

तब लगता मेरी ही हैं ये शीतल मंद हवाऍ
झरते हुए दूधिया झरने, इठलाती सरिताएँ।

हिम से ढ़की हुई चाँदी सी, पर्वत की मालाएँ,
फेन रहित सागर, उसकी लहरें करतीं क्रीड़ाएँ।

दिवस सुनहरे, रात रूपहली ऊषा-साँझ की लाती,
छन-छनकर पत्तों से बुनती हुई चाँदनी जाली।

चाँद का कुर्ता

 चाँद का कुर्ता

-रामधारी सिंह 'दिनकर'-

हठ कर बैठा चाँद एक दिन, माता से यह बोला,
सिलवा दो माँ मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला

सन सन चलती हवा रात भर, जाड़े से मरता हूँ,
ठिठुर ठिठुर कर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूँ।


आसमान का सफर और यह मौसम है जाड़े का,
न हो अगर तो ला दो कुर्ता ही कोई भाड़े का।


बच्चे की सुन बात कहा माता ने- अरे सलोने,
कुशल करें भगवान, लगें मत तुझको जादू-टोने।


जाड़े की तो बात ठीक है, पर मैं तो डरती हूँ,
एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूँ।


कभी एक अंगुल भर चौड़ा, कभी एक फुट मोटा,
बड़ा किसी दिन हो जाता है और किसी दिन छोटा।


घटता बढ़ता रोज किसी दिन ऐसा भी करता है,
नहीं किसी की भी आँखों को दिखलाई पड़ता है।


अब तू ही ये बता, नाप तेरा किस रोज लिवाएँ,
सी दें एक झिंगोला जो हर रोज बदन में आए?

अब यह चिडिया कहाँ रहेगी?

 
अब यह चिडिया कहाँ रहेगी?

-महादेवी वर्मा


आँधी आई जोर शोर से, डालें टूटी हैं झकोर से।

उड़ा घोंसला अंडे फूटे, किससे दुख की बात कहेगी?

अब यह चिडिया कहाँ रहेगी?


हमने खोला अलमारी को, बुला रहे हैं बेचारी को।

पर वो चीं-चीं कर्राती है, घर मे तो वो नहीं रहेगी।

अब यह चिडिया कहाँ रहेगी?


घर में पेड़ कहाँ से लाएँ, कैसे यह घोंसला बनाएँ।

कैसे फूटे अंडे जोड़ें, किससे यह सब बात कहेगी।

अब यह चिडिया कहाँ रहेगी?

नटखट हम हाँ नटखट हम

नटखट हम हाँ नटखट हम, करने निकले खटपट हम।

आ गए लड़के पा गए हम, बंदर देख लुभा गए हम।

बंदर को बिचकाएँ हम, बंदर दौड़ा भागे हम।

बच गए लड़के, बच गये हम, नटखट हम हाँ नटखट हम।


बर्र का छत्ता पा गए हम, बांस उठाकर आ गए हम।

छत्ते लगे गिराने हम, ऊधम लगे मचाने हम।

छत्ता टूटा बर्र उड़े, आ लड़कों पर टूट पड़े।

झटपट हटकर छिप गए हम, बच गए लड़के बच गए हम।


बिच्छू एक पकड़ लाए, उसे छिपाकर ले आए।

सबक जाँचने भिड़े गुरू, हमने नाटक किया शुरू।

खोला बिच्छु चुपके से, बैठे पीछे दुबके से।

बचे गुरूजी खिसके हम, पिट गए लड़के बच गए हम।


बुढिया निकली पहुँचे हम, लगे चिढ़ाने जम जम जम।

बुढिया खीजे डरे न हम, ऊधम करना करें न कम।

बुढिया आई नाकों दम, लगी पीटने धम धम धम।

जान बचाकर भागे हम, पिट गए लड़के, बच गए हम।

-स्वर्ण सहोदर (1902-1980)

पुष्‍प की अभिलाषा


चाह नहीं, मैं सुरबाला के, गहनों में गूँथा जाऊँ।

चाह नहीं प्रेमी माला में बिंध प्‍यारी को ललचाऊँ।

चाह नहीं सम्राटों के शव पर हे हरि डाला जाऊँ।

चाह नहीं देवों के सिर पर चढ़ूँ भाग्‍य को इठलाऊँ।

मुझे तोड़ लेना बनमाली, उस पथ पर देना तुम फेंक।

मातृ भूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जावें वीर अनेक।

-माखनलाल चतुर्वेदी
Related Posts with Thumbnails