हिन्दी ब्लॉगर्स अवार्ड

"संवाद डॉट कॉम" द्वारा 20 श्रेणियों में दिये जाने वाले 2009 के श्रेष्ठ ब्लॉगर्स सम्मान की घोषणा प्रारम्भ हो चुकी है।

अरी चिरइया नींद की, हो जा जल्‍दी फुर्र


काना बाती कुर्र
-कुँअर बेचैन -

अरी चिरइया नींद की, हो जा जल्‍दी फुर्र।
काना बाती कुर्र।

छोड़ अपने आराम को, सूरज निकला काम को,
देकर सबको रोशनी, घर लौटेगा शाम को।
तू भी जल्‍दी छोड़ दे खर्राटों की खुर्र।
काना बाती कुर्र।

जगीं शहर की मंडियॉं, गॉंवों की पगडंडियॉं,
खेतों ने भी दिखलाईं हरी फसल की झंडियॉं।
चली सड़क पर मोटरें, घर घर घर घर घुर्र।
काना बाती कुर्र।

कविवर तोंदू राम बुदक्कड़, कभी कभी आ जाते हैं

-हरिकृष्ण देवसरे-
कविवर तोंदू राम बुदक्कड़,
कभी कभी आ जाते हैं।

खड़ी निरंतर रहती चोटी,
आँखें धंसी, मिचमिची छोटी,
नाक चायदानी की टोंटी,
अंग गंग की छटा निराली
भारी तोंद हिलाते हैं।

कंधे पर लाठी बेचारी,
लटका उसमें पोथी भारी,
लिये हाथ में सुंघनी प्यारी,
सूँघ सूँघकर आ छीं आ छीं
का आनन्द उठाते हैं।

ये है नियमी धर्म धुरंधर,
गायक गुपचुप भाँड उजागर,
परम स्वतंत्र, न नौकर चाकर,
झूम झूमकर मटर मटक कर,
हलुआ पूरी खाते हैं।

कविता का बँध जाता ताँता,
चप्पल का विवाह ठन जाता,
जूता दूल्हा बनकर आता,
बिल्ली रानी, पिस्सू राजा
का भी जोड़ मिलाते हैं।
चित्र साभार- http://in.jagran.yahoo.com/

सुरज जी, तुम इतनी जल्‍दी क्‍यों आ जाते हो

छुटटी नहीं मनाते हो
-कृष्‍ण शलभ-

सुरज जी, तुम इतनी जल्‍दी क्‍यों आ जाते हो ?

लगता तुमको नींद न आती, और न कोई काम तुम्‍हें। 
जरा नहीं भाता क्‍या मेरा, बिस्‍तर पर आराम तुम्‍हें। 

खुद तो जल्‍दी उठते ही हो, मुझे उठाते हो। 
सुरज जी, तुम इतनी जल्‍दी क्‍यों आ जाते हो। 

कब सोते हो, कब उठते हो, कहॉं नहाते धाते हो?
तुम तैयार बताओ हमको, कैसे झटपट होते हो ?

लाते नहीं टिफिन, क्‍या खाना खाकर आते हो। 
सुरज जी, तुम इतनी जल्‍दी क्‍यों आ जाते हो। 

रविवार ऑफिस बंद रहता, मंगल को बाजार भी। 
कभी कभी छुटटी कर लेता, पापा का अखबार भी। 

ये क्‍या बात, तुम्‍हीं बस छुटटी नहीं मनाते हो।
सुरज जी, तुम इतनी जल्‍दी क्‍यों आ जाते हो ?
चित्र साभार-http://www.flickr.com/

मजेदार लगते हैं कितने यार, बताशे पानी के

बताशे पानी के 
-सुंदरलाल अरूणेश-

मजेदार लगते हैं कितने यार, बताशे पानी के। 
देता लच्‍छूराम रूपये में चार बताशे पानी के। 

इनका पानी याद करो, तो मुँह में भर आता पानी, 
इन्‍हें गोलगप्‍पा भी कहते, सूरत जानी पहचानी। 
इसीलिए पाते हैं सबका प्‍यार, बताशे पानी के।

थोड़ी मिली खटाई इसमें, खुश्‍बूदार मसाला है, 
टिक्‍की, खस्‍ता से भी बढ़कर इनका स्‍वाद निराला है। 
पापड़ जैसे कड़क कुरमुरे यार बताशे पानी के।

देर नहीं लगती है, मुँह में रखते ही ये घुल जाते, 
कभी कभी मम्‍मी पापा भी इन्‍हें देखकर ललचाते। 
खाओ भी चटपटे जायकेदार बताशे पानी के।

बस्‍ता मुझसे भारी है

-अवश्‍घोष-

यह कैसी लाचारी है 
बस्‍ता मुझसे भारी है।

कंधा रोज भड़कता है, जाने क्‍या क्‍या बकता है,
लाइलाज बीमारी है, बस्‍ता मुझसे भारी है।

जब भी मैं पढ़ने जाता, जगह जगह ठोकर खाता,
बस्‍ता क्‍या अलमारी है, बस्‍ता मुझसे भारी है।

कान फटे सुनते सहते, मुझे देखकर सब कहते,
बालक नहीं, मदारी है, बस्‍ता मुझसे भारी है।

ये जामुन काले काले हैं

 -विनोदचंद्र पाण्‍डेय ‘विनोद’-

ये जामुन काले काले हैं। 

जब बादल जल बरसाते हैं, ये पेड़ों पर पक जाते हैं,
भौरों सा रूप दिखाते हैं, करते सबको मतवाले हैं।

होते सब खूब रसीले हैं, बैंगनी, लाल या नीले हैं,
सब के सब रंग रंगीले हैं, सुंदर सुकुमार निराले हैं।

देखो, डालों पर लटके हैं, गिरते जब लगते झटके हैं,
बच्‍चे खाते डट डट के हैं, बेचते इन्‍हें फलवाले हैं।

मानो रस में ही पगते हैं, सबको ही अच्‍छे लगते हैं,
ले भी लो बिलकुल सस्‍ते हैं, सब पर जादू सा डाले हैं।
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